आज पूरा संसार भौतिकता की चकाचौंध एवं पाश्चात्य संस्कृति की मार से ग्रसित हो रहा है। इस समय हमें अपने इतिहास को दोहराने की परम आवश्यकता है। अब ‘विज्ञान की नहीं हमें इतिहास’ की जरूरत है। वर्तमान युग कम्प्यूटर-मोबाइल-इंटरनेट का युग है। ऐसे में हमारे धर्म ध्यान का तरीका भी परिवर्तित हो गया। इन साधनों से हमारे ज्ञान का तरीका भी परिवर्तित हो गया। इन साधनों से हमारे ज्ञान का जो विकास होना चाहिए वह नहीं हुआ अपितु अवनति की ओर चला गया। अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ने सब चौपट कर दिया। गुरुकुल प्रणाली की शिक्षा पद्धति में हर बात को कहानी एवं उदाहरणों से समझाया जाता था। वे कहानी एवं उदाहरण आजन्म याद रहते थे एवं प्रतिफल शिक्षा देते रहते थे। आज का व्यक्ति इन्हें मात्र किस्से-कहानी के रूप में लेकर छोड़ देता है जबकि ये किस्से-कहानी बताते हैं कि आपको जीवन में किससे और क्या हानि है? पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज जिनकी ओजस्वी वाणी जन-जन को प्रभावित करती है। वे अपने प्रवचनों में सरल एवं सटीक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जिससे उनकी वाणी को सभी समझते हैं एवं ग्रहण करते हैं। प्रस्तुत पुस्तक में मुनिश्री द्वारा अपने प्रवचनों में जिन कहानी एवं किस्सों का उल्लेख किया जाता है। उन्हीं को संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरी यह भावना है कि हम इन कहानियों के माध्यम से सार की बात समझें। पाठशालाओं में बच्चों को ये कहानियाँ अवश्य सुनायें। इससे उनमें हेय-उपादेय की क्षमता का विकास होगा। पूज्य मुनि श्री की सकारात्मक सोचमंगल-कामना
(सम्प्रति संघानसागर जी महाराज,
संघस्थ आचार्य श्री १०८ विद्यासागरजी महाराज)