भारत की धरा पर अनेक रश्मिरथी योद्धा अवतरित हुए—सूर्य-किरणों से रथ सजाकर, तेज से लोहा बनकर लड़े, परंतु हम अपने ही घर के जयचंदों के हाथों बार-बार हारे हैं। आप अभी जो पढ़ रहे हैं, यह उस हिंदू की गाथा है, जिसकी सभ्यता संसार की सबसे प्राचीन है, जिसने समस्त विश्व को अपना घर माना, जिसका मूल मंत्र है—वसुधैव कुटुम्बकम्। फिर भी वही सभ्यता सदियों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ी रही। वर्तमान का सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्यों? इस प्रश्न का उत्तर जानना इसलिए भी अनिवार्य है, क्योंकि जो सभ्यता अपने इतिहास से सबक नहीं लेती, उसका वर्तमान भविष्य की शिलालेख पर धूमिल हो जाता है, और अंततः नाम ओ निशां मिट जाता है। यह पुस्तक मात्र शब्दों का संग्रह मात्र नहीं, और न ही यह इतिहास की किसी पुरानी तारीख में बंधा हुआ कल। यह एक सजीव प्रयास है—इतिहास के दर्पण में झाँककर वर्तमान को समझने की, और भविष्य को स्वर्णिम बनाने की। यह एक सबक है, एक प्रेरणा है, एक छोटा-सा लेकिन सार्थक प्रयत्न है, क्योंकि हमारी स्याही ने कभी जंग नहीं पकड़ा, और हमारी कलम की धार कभी कुंद नहीं पड़ी। आइए, इस यात्रा में साथ चलें—श्रद्धा से, जिज्ञासा से, और साहस से। क्योंकि सच्चा परिचय वही है, जो न केवल हमें जानने ज्ञान दे, अपितु जागृत भी कर दे।
जय भारत।